Dr. Sarvepalli Radhakrishnan Biography। Teacher Day kyu manaya jata hai ?

teacher day kyu manaya jata hai?

भारत के पूर्व राष्ट्रपति एवं प्रथम उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन को पुरे भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। राधाकृष्णन जी एक अच्छे राजनेता होने से पहले एक प्रख्यात शिक्षक, महान दार्शनिक, एवं हिन्दू विचारक थे. उन्होए अपने जीवन के करीब 40 साल एक शिक्षक के रूप में काम किया था. उन्होंने न सिर्फ देश की नामचीन यूनिवर्सिटी में अपने लेक्चर से भारतीयों का दिल जीता था, बलि विदेशो में भी अपने लेक्चर एवं महान विचारो से लोगो को मन्त्रमुग्ध किया। तो चलिए जानते है की आखिर teacher day kyu manaya jata hai और डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जीवन के बारे में – Dr. Sarvepalli Radhakrishnan Biography

पूरा नाम डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन (Dr. Sarvepalli Radhakrishnan)
जन्म 5 सितम्बर, 188
मृत्यु 17 अप्रैल, 1975
पिता सर्वपल्ली वीरास्वामी
माता सीतम्मा
पत्नी सिवाकामू(1904)
बच्चे 5 बेटे, 1 बेटी
शिक्षा एम्. ए. (दर्शन शास्त्र)
पुरुस्कार भारत रत्न

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जन्म, परिवार और शिक्षा – (Dr. Sarvepalli Radhakrishnan History, biography Hindi)

Teacher Day क्यों मनाया जाता है? ( Teacher Day kyu manaya jata hai )

हमारे देश में 1962 से 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जा रहा है. शिक्षक दिवस हर साल पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती के मौके पर मनाया जाता है. जब उन्होंने राष्ट्रपति का पद ग्रहण किया, उसी साल से उनके सम्मान में उनके जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा. डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन को भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से भी नवाजा गया था।

राधाकृष्णन एक बेहतरीन शिक्षाविद भी थे. डॉ. सर्वपल्ली को २7 बार नोबेल पुरुस्कार के लिए नामित किया गया था. 1954 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया. कहा जाता है की एक बार उनके कुछ विद्यार्थी और दोस्तों ने उनसे उनके जन्मदिन को सेलिब्रेट करने की बात कही. इसके जवाब में उन्होंने कहा था की ‘मेरा जन्मदिन अलग से मनाने के बजाय अगर शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाये तो मुझे गर्व महसूस होगा’.  

जन्म और परिवार(Sarvepalli Radhakrishnan Birth and Family):-

डॉ. राधा कृष्णन का जन्म तमिलनाडु के तिरुतनी गांव में 5 सितम्बर 1888 को हुआ था. जिस परिवार में उन्होंने जन्म लिया वो एक ब्राह्मण परिवार था. उनका जन्मस्थान भी एक पवित्र तीर्थस्थल के रूप में विख्यात रहा है. डॉ. राधा कृष्णन के पूर्वज पहले कभी सर्वपल्ली नामक गांव में रहते थे और 18वी शताब्दी के मध्य में वो तिरुतनी  गांव की ओर स्थानांतरित हो गए. लेकिन उनके पूर्वज चाहते थे की उनके नाम के साथ जन्मस्थान का नाम भी जुड़ा रहे. इसी कारण  उनके परिजन अपने नाम के पहले सर्वपल्ली लगाने लगे. डॉ. राधा कृष्णन एक गरीब किन्तु विद्वान ब्राह्मण की संतान थे. उनके पिता का नाम सर्वपल्ली वीरास्वामी और माता का नाम सीतम्मा था. उनके पिता राजस्वा विभाग में काम करते थे, उनपर बहुत बड़े परिवार के पालन-पोषण  का दायित्व था. वीरास्वामी के पांच पुत्र और एक पुत्री थी और राधा कृष्णन इस सभी सन्तानो में दूसरे स्थान पर थे. उनके पिता काफी कठिनाई के साथ परिवार का निर्वहन कर रहे थे इसी  कारण बालक राधाकृष्णन को बचपन में कोई विशेष सुख प्राप्त नहीं हुआ. 

विधार्थी जीवन(Sarvepalli Radhakrishnan Education):-

डॉ. राधा कृष्णन का बचपन तिरुपति और तिरवंतपुरम जैसे धार्मिक स्थलों पर व्यतीत हुआ. उन्होंने प्रथम 8 वर्ष तिरुतनी में ही गुजारे हालाँकि उनके पिता पुराने विचारो के थे और उनमे धार्मिक भावनाये भी थी. इसके बावजूद उन्होंने राधाकृष्णन क्रिस्चियन मिसनरी संस्था लुथान मिशन स्कूल तिरुपति में 1896 से 1900 तक पढ़ने के लिए भेजा।  फिर अगले के चार वर्ष यानि की 1900 से 1904 की शिक्षा वल्लोर में हुई. इसके बाद उन्होंने मद्रास क्रिस्चियन कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की. वे बचपन से ही एक मेधावी छात्र थे.

 इन 12 वर्षो के अध्यन काल में राधाकृष्णन ने बाइबल के महत्वपूर्ण अंश भी याद कर लिए. इसके लिए उन्हें विशिष्ट योग्यता का   सम्मान प्रदान किया गया. इस उम्र में उन्होंने वीर सावरकर और स्वामी विवेकानंद का भी अध्यन किया। उन्होंने 1902 में मैट्रिक्स स्तर की परीक्षा पास की और उन्हें छात्रविति भी प्राप्त हुई. इसके बाद उन्होंने 1904 में कलसंख्याय परीक्षा प्रथम डिवीज़न में पास की.  राधाकृष्णन को मनोविज्ञान, इतिहास और गणित विषय में विशेष योग्यता की टिपण्णी भी उच्च प्राप्तांको के कारण मिली। दर्शन शास्त्र में MA करने के पश्चात 1916 में वो मद्रास रेजीडेंसी कॉलेज में सहायक प्राध्यापक नियुक्त हुए. डॉ. राधा कृष्णन ने अपने लेखकों और भासणो के माध्यम से विश्व को भारतीय दर्शन शास्त्र से परिचित कराया। सारे विश्व में उनके लेखो की प्रशंसा की गयी. 

पारिवारिक जीवन (Dr. Sarvepalli Radhakrishnan Married life) :-

उस समय मद्रास के ब्राह्मण परिवारों  में काम उम्र में ही शादी सम्प्पन हो जाती थी और  राधाकृष्णन उसके अपवाद नहीं रहे. 1903 में मात्र 16 वर्ष की आयु में उनका विवाह एक दूर की रिस्तेदार शिवाकामु से सम्प्पन हो गया. उस समय उनके पत्नी की आयु मात्र 10 वर्ष की थी. इसी कारण तीन वर्ष बाद ही उनकी पत्नी ने उनके साथ रहना शुरू किया। हालाँकि उनकी पत्नी शिवकामू  ने परंपरागत तरीके से शिक्षा प्राप्त नहीं की थी लेकिन उनका तेलुगु भाषा पर अच्छा पकड़ था.  वो अंग्रेजी भाषा भी लिख पढ़ सकती थी. डॉ. राधाकृष्णन जी पत्नी की मृत्यु 1956 में हो गयी थी. भारतीय क्रिकेट टीम के महान खिलाडी वीवी एस लक्ष्मण इन्ही के खानदान से ताल्लुक रखते है.

 1908 में राधाकृष्ण दम्पति को संतान के रूप में पुत्र की प्राप्ति हुई. डॉ. राधा कृष्णन ने 1908 में ही कला स्नातक की उपाधि प्रथम श्रेणी में प्राप्त की और दर्शन शास्त्र में विशेष्ट योग्यता प्राप्त की. उच्च अध्यन के दौरान वो अपने निजी आमदनी के लिए बच्चो को टूशन पढ़ाने का काम किया करते थे. 1908 में उन्होंने MA की उपाधि प्राप्त करने के लिए शोध लेख भी लिखा। इस समय उनकी आयु मात्रा बीस वर्ष की थी. जल्द ही उन्होंने वेदो और उपनिषदों का भी अध्यन कर लिया। इसके अतरिक्त उन्होंने हिंदी और संस्कृत भाषा का भी विस्तृत अध्यन किया। 

हिन्दू शास्त्रों का अध्यन :-

शिक्षा का प्रभाव जहा प्रत्येक व्यक्ति पर निश्चित रूप से पड़ता है, वो वही शैक्षिक संस्था की गुणवत्ता भी अपना प्रभाव छोड़ती है. क्रिस्चियन संस्थाओं द्वारा उस समय पश्चिमी मुलो को विद्यार्थी जीवन में काफी गहराई तक स्थापित किया जाता था. यही कारण है की क्रिस्चियन संश्थाओं में अध्यन करते हुए  राधा कृष्णन के जीवन में उच्च गुण समाहित हो गए लेकिन उनमे एक अन्य परिवर्तन भी आया जो की क्रिस्चियन संस्थाओं के कारण ही था. कुछ लोग हिंदुत्व वादी विचारो को नीची नज़रो से देखते थे और उनकी आलोचना भी करते थे. उनके आलोचनाओं को राधाकृष्णन ने चुनौती की तरह लिया और हिन्दू शास्त्रों का गहरा अध्यन करना प्रारम्भ कर दिया।

दरअसल राधाकृष्णन ये जानना चाहते थे की वस्तुतः किस संस्कृत के विचारो में चेतना है और किस संस्कृति के विचारो में जड़ता है. इस कारण राधाकृष्णन ने तुलनात्मक रूप से ये जान लिया था की हिन्दू धर्म काफी समृद्ध है और क्रिस्चियन मिसनरिओ द्वारा हिंदुत्व की आलोचनाएं निराधार है. इससे उन्होंने ये निष्कर्ष निकाला की हिंदुत्व धर्म, ज्ञान और सत्य पर सत्य पर आधारित है जो की प्राणी को जीवन का सच्चा सन्देश देती है.  डॉ. राधा कृष्णन सम्मुच्या विश्व को एक विद्यालय मानते थे. उनका मानना था की शिक्षा के द्वारा ही प्राणी का उद्धार  किया जा सकता है. अतः विश्व को एक ही इकाई मानकर शिक्षा का प्रबंधन करना चाहिए। 

डॉ. राधाकृष्णन की राजनीति में आगमन :-

जब भारत को स्वतंत्रा मिली उस समय जवाहरलाल नेहरू ने राधाकृष्णन से यह आग्रह किया, की वह विशिष्ट राजदूत के रूप में सोवियत संघ के साथ राजनयिक कार्यो की पूर्ति करे. नेहरूजी की बार को स्वीकारते हुए डॉ. राधाकृष्णन ने 1947 से 1949 तक सविधान  सदस्य  के रूप  में कार्य किया। संसद  में सभी लोग उनके कार्य और व्यहार की बेहद प्रशंसा करते थे. अपने सफल अकादमिक करियर के  बाद उन्होंने राजनीतिकी में अपना कदम रखा. 

13 मई, 1952 से 13 मई,1962  तक वे देश के उपराष्ट्रपति रहे. 13 मई, 1962 को ही वे भारत के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए. राजेंद्र प्रसाद की तुलना में इनका कार्यकाल काफी चुनौतियों भरा था, क्योकि जहा एक और भारत के चीन और पाकिस्तान के साथ युद्ध हुए, जिसमे चीन के साथ भारत को हार का सामना करना पड़ा. वही दूसरी ओर दो प्रधानमंत्री का देहांत भी इन्ही के कार्यकाल के दौरान ही हुआ था. उनके काम को लेकर साथ वालो को, उनसे विवाद काम सम्मान ज्यादा था.   

डॉ. राधाकृष्णन अवार्ड (Dr. Radhakrishnan awards) :-

. शिक्षा और राजनीती में उत्कृष्ट योगदान देने के लिए डॉ. राधाकृष्णन को सन 1954 में सर्वोच्च अलंकरण “भारत रत्न” से सम्मानित किया गया.

. 1962 से राधाकृष्ण जी के सम्मान में उनके दिवस 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की गयी.

. सन 1962 में डॉ. राधाकृष्णन को “ब्रिटिश अकादमी” का सदस्य बनाया गया.

. पोप जॉन पाल ने इनको “गोल्डन स्पर” भेट किया।

. इंग्लैंड सरकार द्वारा इनको “आर्डर ऑफ़ मेरिंट” का सम्मान प्राप्त हुआ.

डॉ. राधाकृष्णन ने भारतीय दर्शन शास्त्र एवं धर्म के ऊपर अनेक किताबे लिखी जैसे “गौतम बुद्धा: जीवन और दर्शन”, “धर्म और विश्व” आदि. वे अक्सर किताबे अंग्रेजी में लिखते थे.

1967 के गणतंत्र दिवस पर डॉ. राधाकृष्णन ने देश को सम्भोधित करते हुए यह स्पष्ट किया था, की वह अब किसी भी सत्र के लिए राष्ट्रपति नहीं बनना चाहेंगे और बतौर राष्ट्रपति ये उनका आखिरी भाषण रहा. 

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की मृत्यु (Sarvepalli Radhakrishnan Death) :-

17 अप्रैल, 1975 को एक लम्बी बीमारी के बाद डॉ. राधाकृष्णन का निधन हो गया. शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान हमेशा याद किया जाता है. इसीलिए 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस मनाकर डॉ. राधाकृष्णन के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है. इस दिन देश के विख्यात और उत्कृष्ट शिक्षकों को उनके योगदान के लिए पुरूस्कार प्रदान किये जाते है. राधाकृष्णन को मरणोपरांत 1975 में अमेरिकी सरकार द्वारा टेम्पलटन पुरुस्कार से सम्मानित किया गया, जो की धर्म के क्षेत्र में उत्थान के लिए प्रदान किया जाता है. इस पुरूस्कार को ग्रहण करने वाले यह प्रथम गैर-ईसाई संप्रदाय के व्यक्ति थे.  

शिक्षक दिवस ( Teacher’s Day) :-

हमारे देश के द्वितीय किन्तु अद्वितीय राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिन(5 सितम्बर) को प्रतिवर्ष ‘शिक्षक दिवस’ के रूप में मनाया जाता है. इस दिन समस्त देश में भारत सरकार द्वारा श्रेष्ठ शिक्षकों को पुरस्कार भी प्रदान किया जाता है. 

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