Swami Prabhupada kon hai, प्रभुपाद कोन हैं ?

Prabhupada kon hai
Prabhupada kon hai

प्रभुपाद कोन हैं ? ( Prabhupada kon hai )

Prabhupada एक ऐसा सन्यासी जिसके पास खाने और रहने के लिए पर्याप्त चीज़े नहीं थी, उन्होंने पाकिस्तान जैसे मुस्लिम देश में 12 Hindu मंदिरो का निर्माण करवाया | Iskon जो दुनिया के प्रसिद्ध organization में से एक है, जिसके 600 से भी ज्यादा Centers है पूरी दुनिया मैं | इतने बड़े organization को एक सन्यासी ने 1966 में हरी कृष्णा moment के नाम से खड़ा किया | अपने गुरु के कहने पे उन्होंने हिन्दू धर्म के महान ग्रन्थ बागवद गीता को English भाषा में translate किया और पुरे दुनिया में उसका प्रचार किया |आईये जानते हैं बारीकी से सिरला प्रभुपाद के बारे मै की प्रभुपाद कोन हैं ? ( Prabhupada kon hai )

I am always servant of god, but it is for you to recognize. ( I’m trying to become a servant of god )

जन्म, शिक्षा और प्रारम्भिक जीवन :

Swami Prabhupada का जन्म 1 Sep., 1896 में कोलकाता के बंगाल में हुआ था | उनका पूरा नाम Abhay Charanaravinda Bhakti Vedanta Swami Srila Prabhupada था | जब वो 14 वर्ष के थे, तब उनकी माता का देहांत हो गया |

उन्होंने अपनी पढ़ाई Scottish Church College से अंग्रेजी में की | वो बचपन से ही पढ़ाई में बहुत अच्छे थे | लेकिन गांधीजी द्वारा चलाये गए Non-Cooperation Movement में शामिल होकर उन्होंने अपनी degree लेने से मना कर दिया |

स्वामीजी शुरू से संन्यासी नहीं थे, उनका खुद का Prayagraj (Allahabad) में Pharmacy था | लेकिन 1922 में उनकी मुलाकात उनके गुरु से हुई, तभी उनके गुरु को यह समझ आ गया था कि श्रीला Prabhupada जी की इंग्लिश बहुत अच्छी है, क्योंकि जब Swami Prabhupada इंग्लिश बोलते थे तो अंग्रेज़ dictonary में उस शब्द को खोजते थे |

तभी उनके गुरु ने उनसे पूछा की , “तुम्हारी English बहुत अच्छी है और तुम्हारा शास्त्र में भी मन लगता है | क्या तुम भगवद गीता को English में लिख सकते हो ? क्योंकि हमारी देश की किताबें विदेश में नहीं जा रही है, जबकि विदेश देश की किताबें हमारे यहाँ आती है ” | इसीलिए तुम्हे भगवद गीता पूरी दुनिया में पहुँचाना चाहिए |

PRABHUPADA VANI

Translation of Granths in English :

Swami Prabhupada जी ने अपने गुरुजी के सपने को पूरा करने का ठाना और अगले ही दिन से वो भगवद गीता को English में लिखने लगे | उस समय आज की तरह Laptop और Typewriter नहीं था, लेकिन वो भगवद गीता जैसी मोटी पुस्तक को English में लिखते रहे |
लिखते लिखते पूरे एक साल गुजर गये, उन्होंने कई सारे पन्ने में भगवद गीता लिखा |

एक दिन जब वो pharmacy से अपने घर को लौटे तो वह चौक गए क्योंकि उन्हें वो सारे कागज नहीं दिख रहे थे जिसमें उन्होंने भगवद गीता लिखा था | उन्होंने तुरंत अपनी पत्नी से पूछा की “क्या तुमने वो कागज देखा क्या?”, पत्नी का जवाब सुनकर स्वामी जी उदास हो गए | उनकी पत्नी ने कहा मैंने सारे कागज को रद्दी वाले को बेच दिया और बदले में उसने मुझे चायपत्ति दी | उसी के बाद से उन्होंने अपना घर छोड़ दिया और सन्यासी बन गए |

उन्होंने फिर से भगवद गीता लिखना शुरू किया और वो वृन्दावन चले गए | उन्होंने सोचा की मेरा वृन्दावन रहने का कोई तात्पर्य नहीं, मुझे विदेश में जाना चाहिए | उस समय दुनिया का शक्तिशाली देश था अमेरिका और अमेरिका का मशहूर शहर है New York | इसीलिए वो New York को और चल पड़े |

उस समय उनकी उम्र 70 साल थी | और उस उम्र भी उन्होंने 32 दिन तक जहाज में सफर किया | सफर के दौरान उन्हें 2 Heart Attack आये और उनके पास सिर्फ 7 Dollars और कुछ पुस्तकें थी |

PRABHUPADA VANI

Shrila Prabhupada Vani And Hippies :


1965 में जब अमेरिका और वियतनाम का वॉर चल रहा था, तब अमेरिका में Hippies आ गए थे और पूरे अमेरिका को उन्होंने परेशान कर रखा था | वो बिना कपड़ो के सडको पर घूमते थे , कई महीनों तक नहाते नहीं थे, नशा करते थे |

स्वामी जी को समझ आ गया की अगर मुझे अमेरिका में कुछ करना है तो मुझे Hippies को सुधारना पड़ेगा | लेकिन Hippies इनकी सुनते नहीं थे, इनका समान चोरी कर लेते थे, इनके ऊपर सिगरेट का धुआँ फूकते थे, इनको toilet की लाइन में धक्का दे देते थे |

लेकिन स्वामीजी उनके ऊपर कभी गुस्सा नहीं होते थे बल्कि वो Hippies के लिए भोजन बनाते थे, उनको भगवद गीता का पाठ पढ़ाते थे | इसीलिए धीर धीरे Hippies को Swami Prabhupada की बात समझ में आने लगी और वो स्वामीजी की बात को मानने लगे |

तब के ज़माने में लोग अंग्रेज़ो की बात सुनते थे, लेकिन New York के लोग स्वामी Prabhupada की बात सुनते थे और इसी वजह से स्वामीजी सारे Hippies का नशा धीरे-धीरे छुड़ाने लगे | और सारे Hippies को Happy बना दिया | वो रोज Hippies को मीठे गुलाब जामुन खिलाते थे, और उन्होंने जीवन जीने का सही उद्देस्य बताते थे |

Swami Prabhupada ने धीरे-धीरे करके America में 10 हज़ार शिस्य बनाये | और उन् शिस्यो को उन्होंने दुनिया के कही जगहों पर भगवद गीता का प्रचार करने के लिए भेजा, जिसमे पाकिस्तान भी था | उन्होंने अपने शिस्यो को कहा “मैंने तुम्हे बहुत कुछ सिखाया है, अब तुम्हारी बारी है | अब तुम लोग दूसरे को जाकर सिखाओ” | इन्होने 1965 से लेकर 1977 तक 10-12 साल Hippies को बदलने में ही लगा दिया |

SWAMI PRABHUPADA VANI

धीरे-धीरे इनके पास पैसे की कमी होने लगी, पैसों की कमी पूरा करने के लिए उन्होंने अगरबत्ती बनाने का काम शुरू किया | वे अपने शिष्यों साथ अगरबत्ती बेचा करते थे और मात्र तीन साल के अंदर 1 Million Dollar का लाभ हुआ | और इस दौरान भी उन्होंने अपने गुरु के आदेश का पालन करते हुए 500 करोड़ पुस्तके पूरी दुनिया में बांट दिया | और इन् सब से जो पैसा मिला उन्होंने उस पैसो से मंदिर बनवाना शुरू कर दिया | उन्होंने अपनी पुस्तकों को पुरे 25 भाषाओं में Translate किया |

एक बार एक रिपोर्टर ने उनसे पूछा की “ क्या आप भगवान हो ” , तो उन्होंने उत्तर दिया, “ नहीं मै एक भगवान का सेवक और नौकर हूं ” | यह सुनकर रिपोर्टर चौक गया क्योकि पहली बार कोई भारतीय स्वामी अपने आप को भगवान का सेवक और नौकर बता रहा है | इस interview के बाद ये बात वहां के सारे अखबारों में छप गई |

उनके बाद Henry Ford के पोते Alfred Ford स्वामी जी से मिलने आये, स्वामी जी ने पूछा, “ Who is Henry Ford? ”|
Alfred Ford ने कहा Henry Ford मेरे दादा और Ford Company के founder थे |
स्वामी जी ने फिर से उनसे पूछा, “ Now Where is he? ” |
तब Alfred Ford को समझ आ गया की दुनिया में हर कोई खाली हाथ आता है और खाली हाथ जाता है | Alfred Ford ने स्वामी जी से भगवत गीता सीखाने का आग्रह किया और स्वामीजी ने उन्हें भगवत गीता का पाठ पढ़ाया |

उन्होने भगवत गीता की मदद से पुरे दुनिया में Iskcon Temple का निर्माण करवाया, पाकिस्तान जैसे मुस्लिम देश में भी उन्होंने 12 Iskcon Temple का निर्माण कराने में सफल रहे और पाकिस्तान में आज भी शाम में Iskcon Temple में आरती और भजन होता है |

प्रभुपाद कोन है

Swami Prabhupada ने कुल 108 Iskcon Temple का निर्माण करवाया पुरे 6 Continent में | इनके पास अपने शिष्यों को देने के लिए पैसे नहीं थे और उस समय में Loan और Fund की भी सुविधा नहीं थी, लेकिन फिर भी इन्होने लोगों को एक धागे में पिरो के रखा |स्वामी जी ने दूर देश में रह रहे अपने शिष्यों से बात करने के लिए 10,000 से भी ज्यादा पत्र लिखे | उम्र के साथ वो धीरे धीरे कमजोर होते जा रहे थे, अब वो पुस्तक लिखने के लिए Dictaphone का इस्तेमाल करते थे | स्वामी जी इसमें record करते थे और उस recording से उनके शिष्य Books लिखते थे |

आप को जानकर यह हैरानी होगी Prabhupada दिन के सिर्फ 2 घंटे आराम करते थे और 22 घंटे काम करते थे |

PRABHUPADA

जगन्नाथ रथ यात्रा :

एक बार Prabhupada अपने शिष्यों के साथ जगन्नाथ रथ यात्रा में शामिल होने के लिए गए लेकिन वहां के पुजारी ने उन्हें यह कहकर रोक दिया की अंग्रेज़ों को मंदिर में जाने की इजाजत नहीं है | स्वामी जी ने कहा “ अगर आप मुझे रथ यात्रा में आने नहीं देंगे तो मै यह रथ यात्रा पूरी दुनिया में ले जाउगा ” और फिर Swami Prabhupada ने ही पहली बार बाहर के देशो में रथ यात्रा प्राम्भ किया |

Food For LIfe :

स्वामी जी ने एक प्रोग्राम शुरू किया जिसका नाम Food For LIfe रखा गया, जो दुनिया का सबसे बड़ा Vegeterian Food Relif प्रोग्राम है | दुनिया के हर Iskon Temple में आपको free में भर पेट vegeterian खाना मिलेगा |

Apple के महान Founder Steve Jobs ने एक बार अपने भाषण में कहा कि पहले उनके पास पैसे नहीं हुआ करते थे इसलिए वो 7 मील दूर चलकर Iskcon Temple में खाना खाने जाते थे |

PRABHUPADA VANI

प्रभुपाद की 125 वी जन्मदिन पर भारत सरकार से सम्मान :

प्रभुपाद जी की 125 वे जन्मदिवस पर प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी ने जारी किआ 125 रुपया का सिक्का जिसके पीछे सिरला प्रभुपाद जी की एक तसवीर लगी हुई है। निचे दिए गई तस्वीर मई जैसा की आप देख सकते हैं।

125 rupees Coin on 125th birth anniversary of sirla Prabhupada ji

G KISHAN Reddy ने ट्वीट किया ” Made opening remarks at the virtual event organised to commemorate the 125th Birth Anniversary of His Divine Grace A.C. Bhaktivedanta Swami Srila Prabhupada Ji.

Prime Minister Shri @NarendraModi delivered his addressed and released a ₹125/- commemorative coin on this occasion.”

मृत्यु :

1977 में Swami Prabhupada जी की तबियत बहुत ख़राब हो गयी थी | वे बहुत पतले हो गए थे यहाँ तक की उनके शरीर में सिर्फ हड्डियां बची थी, इसीलिए डॉक्टर भी उनका इलाज करने से डरता था की कही कोई गलत नश ना दब जाए | अपने अंतिम समय में भी वो Books को english में translate करते रहे और 14 November, 1977 को वो स्वर्ग सिधार गए|

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