About PrithviRaj Chauhan in Hindi – Short Biography

About PrithviRaj Chauhan in Hindi

एक अपराजित और साहसी हिन्दू योद्धा – राजा पृथ्वीराज चौहान ( A Undefeated And Courageous Hindu WarriorKing PrithviRaj Chauhan)

 Born          :     1149,  Ajmer
 Father        :     Raja Sumeshawar
 Mother        :     Karpura Devi
 Spouse        :     Rani Sanyogita
 Died          :     1992 

भारत देश के सबसे महान और साहसी हिन्दू और राजपूत राजाओं में से एक PrithviRaj Chauhan, जिन्होंने गौरी जैसे Mughals को लगातार 17 बार हराया था | PrithviRaj Chauhan मुग़ल वंश के पहले दिल्ली की गद्दी पे बैठने वाले आखिरी हिन्दू राजा थे | PrithviRaj Chauhan शब्दभेदी विद्या जानते जिससे वो बिना देखे लक्ष्य पे सटीक निशाना लगा सकते थे |

जन्म और शिक्षा :-

राजा पृथ्वीराज चौहान का जन्म 1149 में चौहान वंश के क्षत्रिय शासक सोमेश्वर के घर में हुआ था | इनकी मां का नाम कर्पूरादेवी था | ऐसा कहा जाता है की वो अपने माता-पिता के शादी के कई साल बाद कई मन्नत बाद जन्मे थे| उनके जन्म से ही उनको मारने के लिए कई बार प्रयास किया गया लेकिन राजा सोमेश्वर ने हर बार उन पर एक भी आंच न आने दी |

राजघराने में पैदा होने की वजह से उनका पालन-पोषण काफी सुख सुविधाओं से था | उन्होंने सरस्वती कंठाभरण विद्यापीठ से शिक्षा प्राप्त की थी जबकि शस्त्र और युद्ध उन्होंने अपने गुरु श्री राम जी प्राप्त थी | पृथ्वीराज काफी बलवान और साहसी थे| उन्होंने शुरुआत से ही शब्द भेदी बाण चलाने की अद्भुत विद्या सीख ली थी, जिसमे वो बिना देखे सिर्फ आवाज़ पर सटीक निशाना लगा सकते थे | जब पृथ्वीराज 11 साल के थे, उनके पिता सोमेश्वर की एक युद्ध में मृत्यु हो गई , जिसके बाद वे Ajmer के उत्तराधिकारी बने |

पृथ्वीराज की माँ कर्पूरादेवी अपने पिता अनंगपाल तोमर(Anangpal Tomar) की इकलौती बेटी थी | पृथ्वीराज के नाना ने उनके साहस और युद्धनीति को देखकर उन्हें Delhi के उत्तराधिकारी बनाने का घोषणा किया | 1166 में उनके नाना के मृत्यु के बाद पृथ्वीराज Delhi के सिंहासन पर बैठे और पूरी जिम्मेदारी के साथ उन्होंने दिल्ली का कार्यभार संभाला | अपने राज्य के विस्तार को बढ़ाने के लिए उन्होंने कई विजय अभियान चलाया | और इस तरह से वो एक वीर योद्धा और शाशक कहलाने लगे |

PrithviRaj Chauhan की प्रेम कथा :-

पृथ्वीराज और रानी संयोगिता की प्रेम कहानी की आज भी याद किया जाता है | PrithviRaj के वीरता और साहस के किस्से हर तरफ थे वही जब Raja Jaichand की बेटी Rani Sanyogita ने PrithviRaj के बहादुरी के किस्से सुने, तब वो PrithviRaj से प्यार कर बैठी| Rani Sanyogita चोरी-छिपे गुप्त रूप से PrithviRaj को खत भेजने लगी | PrithviRaj भी उनके खूबसूरती से काफी प्रभावित थे और उन्हें अपना दिल दे बैठे थे | वही जब Raja Jaichand को इन् सब चीज़ो के बारे में पता चला तो उन्होने अपने बेटी के विवाह के लिए स्वयम्बर करने का फैसला किया | और इसी समय Raja Jaichand पुरे भारत में राज चलाने इरादे से अस्वमेघ यख का आयोजन भी किया था |

PrithviRaj कभी नहीं चाहते थे की भारत में क्रूर और घमंडी राजा का राज हो, इसीलिए उन्होंने जैचंद का विरोध किया था | Raja Jaichand के मन में PrithviRaj के खिलाफ और क्रोध उत्तपन हो गया | उन्होंने अपने बेटी के स्वयम्बर के लिए कई छोटे बड़े महान लोगो को नेवता दिया लेकिन PrithviRaj को अपमानित करने के लिए नेवता नहीं भेजा और अपने महल के द्वार पर द्वारपालों के स्थान पर उनका मूर्ति बनवाकर लगवा दिया | ऐसा कहा जाता था की उस समय हिन्दू लड़कीओ को अपना मनपसंद वर चुनने का पूरा अधिकार था और स्वयम्बर में रानी Sanyogita जिस किसी के भी गले में माला डालती वो उनका पति बन जाता |

जब Sanyogita अपने हाथ में माला लेके कई राजाओ के सामने से गुज़र रही थी तब उनकी नज़र द्वार पे ख़ड़े PrithviRaj के मूर्ति पर पड़ी और उन्होंने वह माला उस मूर्ति पर डाल दिया |

इसको देखकर स्वयम्बर में आए सभी लोग खुद को अपमानित समझने लगे | PrithviRaj अपनी योजना के अनुसार उस मूर्ति के पीछे खड़े हुए थे और जैसे ही Sanyogita ने मूर्ति के गले में माला डाला, उन्होंने Raja Jaichand के सामने Sanyogita को अपने घोड़े पे बैठाया और स्वयम्बर में उपस्तिथ सभी राजाओ को युद्ध के लिए ललकार कर अपने राज्य चले आये |

इसको देखकर Raja Jaichand आग बबूला हो गया और उसने अपनी सेना को PrithviRaj के पीछे लगा दिया , लेकिन उसकी सेना PrithviRaj का कुछ भी ना बिगाड़ पाई | हालाँकि 1189 और 1190 में PrithviRaj और Raja Jaichand बिच भयंकर युद्ध हुआ | यहाँ पे भी Raja Jaichand को हार का सामना करना पड़ा |

PrithviRaj And Md. Gauri का युद्ध :-

मोहम्मद गौरी अफ़ग़ान का शासक था और भारत पर राज करने का सपना लेके भारत के ओर रवाना हो चूका था | उसने अपने शुरुवाती अभियान में Punjab कई हिस्सों पे अपना अधिकार जमा लिया था | उसने PrithviRaj के सिमा Bathinda पर भी हमला बोल दिया | जैसे ही PrithviRaj को यह पता चला वो अपनी सेना को लेके युद्ध के लिए Bathinda पहुंच गए | और फिर युद्ध में मोहम्मद गौरी को हार का सामना करना पड़ा | PrithviRaj ने Md. Gauri को झमा कर दिया | जब यह बात Raja Jaichand को पता चली तो उसने अपने अपमान का बदला लेने का सोचा , और मोहम्मद गौरी से हाथ मिला लिया | इसी बीच 1991 में तराइन(Tarain) का पहला युद्ध हुआ था जिसमें गौरी को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा |

PrithviRaj ने गौरी को लगातार 17 बार शिकस्त दी थी, लेकिन हर बार उन्होंने उसे जीवित ही छोड़ दिया था| शायद ये उन की बहुत बड़ी गलती थी |

1992 में तराइन(Tarain) का दूसरा युद्ध हुआ , इस युद्ध में PrithviRaj का सैन्य बल कम था | स्वयम्बर में PrithviRaj द्वारा किये गए अपमान से कोई भी राजा उनकी मदद नहीं करना चाहता था | Raja Jaichand ने PrithviRaj का भरोसा जीतने के लिए अपना सैन्य बल PrithviRaj को सौंप दिया | वही उदार स्वभाव के PrithviRaj उसके चाल को समझ न पाए | और इस तरह से युद्ध के दौरान Jaichand के सैनिक PrithviRaj के सैनिक को मारने लगी | आखिरकार इस युद्ध में गौरी धोखे के साथ जीत गया और PrithviRaj Chauhan और उनके प्रिय मित्र Chand Bardai को बंदी बना लिया गया |

गौरी उन्हें अपने साथ Afghanistan ले गया | उसे PrithviRaj के हाथो कई बार हार का सामना करना पड़ा इसीलिए उन्हें मारने के बजाय उसने PrithviRaj को कई बार बुरी तरह से टार्चर किया | एवं PrithviRaj को मुस्लिम बनने के लिए भी प्रताड़ित किया | इन सब के बाद भी PrithviRaj चौहान कभी भी गौरी के सामने नहीं झुके | गौरी के दरबार में PrithviRaj Chauhan सीना तान के खड़े थे और यह देखकर गौरी ने कहा तुम राजा के दरबार में खड़े हो अपनी नज़रो को नीचे रखो | इसका जवाब PrithviRaj ने ऐसा दिया की वह पे सभी लोगो के रौंगटे खड़े हों गए उन्होंने कहा

“ एक सच्चे राजपूत की नज़रे केवल मौत ही झुका सकती है ”

इस बात को सुनकर गौरी को गुस्सा आ गया और उसने PrithviRaj के आँखों को फोड़ने का आदेश दे दिया| और फिर उन्हें जेल में डाल दिया गया | PrithviRaj का दर्द उनके प्रिय मित्र Chand Bardai से सहा नहीं गया और उन्होंने गौरी को सबक सिखाने का सोचा |

उन्होंने गौरी को बताया कि PrithviRaj के पास शब्दभेदी विद्या है जिससे की वो लक्ष्य पर बिना देखे सटीक निशाना लगा सकते है | गौरी ने PrithviRaj को इस विद्या को दिखाने के लिए कहा | गौरी को इसपे भरोसा न था की कैसे कोई अँधा आदमी तीर चला सकता है |

PrithviRaj को दरबार में बुलाया गया और तीर और बाण दिया गया | इसी बीच PrithviRaj ने अपने प्रिय मित्र Chandbar Dayi के दोहे की मदद से गौरी के दरबार में ही उसका वध कर दिया |

ये दोहा कुछ इस प्रकार था —

“ चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण,

ता ऊपर सुल्तान है मत चुको चौहान ”

इसके बाद PrithviRaj Chauhan और Chand Bardai ने अपने दुश्मनों के हाथों मरने के बजाय एक दूसरे पर बाण चलाकर अपना जीवन ख़तम कर लिया | जब उनके मृत्यु की खबर उनकी पत्नी Sanyogita को पता चला तो उन्होंने भी अपने जीवन को खत्म कर लिया |

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